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जय श्री कृष्ण 🚩
मनुष्य जब किसी ग्रन्थ को पढ़ता है, तो उसके भीतर पहले से अनेक धारणाएँ होती हैं। यदि वह केवल अपनी मान्यताओं को प्रमाणित करने के लिए पढ़ेगा, तो ग्रन्थ से नया ज्ञान प्राप्त करना कठिन होगा।
आज से दो अभ्यास कीजिये -
•• वाणी में सत्य : किसी बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहने से बचें।
•• व्यवहार में विनम्रता : असहमति होने पर भी अपमानजनक भाषा का प्रयोग न करें।
श्री सीताराम🌺 सीताराम🌺 सीताराम🌺
शाक्त धर्म का मूल नहीं है मांस
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यह भ्रम है कि शाक्त हिन्दू सिर्फ मांसाहारी ही होंगे या उनमें मांस की प्रधानता ही होगी। पूरे उत्तर पश्चिम में शाक्त मत सात्विक ही प्रायः रहा है। खीर पूड़ी हलुवे के भोग से ही राजस्थान से बिहार तक भगवती प्रसन्न हो जाती है, कौन है जो इसका भोग भगवती को नहीं लगाता? या इससे भगवती प्रसन्न नहीं होती।
पशु बलि बहुत ही सीमित वर्ग में प्रचलित रही है इधर। यह अठावरी पूजना आदि सब सात्विक बलि के ही रूप हैं यहां। ब्राह्मण द्वारा तो बलि का पूर्ण निषेध के वचन शास्त्र में भरे पड़े हैं, ब्राह्मण को पशुबलि देने से ब्रह्महत्या लगती यह तक लिखा है इसलिए इधर भारत में प्रायः ही ब्राह्मणों में बलि नहीं रही है। राजाओं व सीमित वर्ग में ही बलि रही है। व यह भगवती की प्रसन्नता का एकमात्र कारण कभी नहीं रही है। मांस शाक्त धर्म का core नहीं है।
बड़े बड़े शाक्त धुरन्धर घोर शाकाहारी रहे हैं, चाहे दतिया के भगवती बगलामुखी के परम सिद्ध उपासक राष्ट्रऋषि स्वामीजी महाराज हों जो पूर्ण शाकाहारी थे, या महान तंत्राचार्य सप्तशतीसर्वस्व के रचयिता जयपुर के राजपण्डित श्री सरयू प्रसाद द्विवेदी जी हों या चाहे मूल रूप से बंगाली परमशाक्त महामहोपाध्याय पण्डित श्री गोपीनाथ कविराज ही क्यों न हों। ये सभी व ऐसे महान शाक्त विद्वान साधक आचार्य घोर शाकाहारी रहे हैं।
शाक्त साधक आचार्य परम्परा का अनुशीलन करेंगे तो 90% उसमें शाकाहारी मिलेंगे उत्तर पश्चिम में सब जगह। सब जगह दक्षिणाचार ही है। स्वयं शृंगेरी, पुरी, कांची, द्वारका आदि के शंकराचार्य घोर शाक्त और भगवती के उपासक ही हैं, व मठ आदि में मांस का जरा भी व्यवहार नहीं होता न उनकी पूजित भगवती के लिए होता। तो क्या वो शाक्त नहीं हैं या भगवती के भक्त नहीं हैं? मांस को कोर शाक्त कहना ऐसा ही है जैसे मंजीरे को कोर वैष्णव कहना। जो मंजीरा नहीं बजाएगा उसे वैष्णव ही नहीं मानेंगे!
आपको पता न हो पर तन्त्र आगम की अनेक दुर्लभ देवियां, जिनका वर्णन विधान विशद है सनातन आगम में पर प्रायः न मिलतीं, वे जैनियों में अच्छे से पूजित हैं जैसे ज्वालामालिनी, चक्रेश्वरी, त्वरिता आदि व पद्मावती, अम्बिका, लक्ष्मी, सरस्वती तो सर्वत्र प्रधान हैं ही। पर दुर्लभ तांत्रिक देवियों की बात कर रहा, जैनों में देवी पूजन सुदृढ परम्परा है, अनेक देवियों के विशद विधान सनातनी व जैन में एक समान ही है। वहां तो मांस के उपयोग का प्रश्न ही नहीं उठता तो क्या वहां देवी प्रसन्न ही नहीं होती?
राजस्थान में करणी माता जी जो स्वयं भगवती की परम भक्त व स्वयं देवी हैं, उनकी उपासना भी पूर्ण सात्विक ही है। बहुत सीमित प्राचीन मंदिरों को छोड़कर अधिकांश प्राचीन देवी मंदिरों पीठों में मांस का कुछ भी व्यवहार नहीं होता। जिनमें होता था वह केवल विशिष्ट दिन बलिदान होता था, न कि मंदिर के आगे मांस ही मांस की दुकानें हों। मंदिरों के आगे मांस की दुकानों की तो पूरे शाक्त धर्म में कहीं कोई मान्यता नहीं है। बलिदान और मांस भी पूर्णतः पृथक ही है।
मांस के बिना भगवती की पूजा ही नहीं होती यह सोचना निरी मूर्खता है। स्वयं हाथ में जल लेकर संकल्प कर दे मैं अपना बल भगवती को समर्पित रहा हूँ, यह भी बलि है, संकल्प करते ही बल का बलिदान होगा और देह क्षीण प्रतीत होगा कुछ क्षण के लिए। देवी के श्रीचरणों में लोट लगाने वाले उच्चकोटि के मनचले भक्त तो स्वयं की बलि देते देखे गए हैं, जैसे महाराज सुरथ और वैश्य समाधि ने दी थी, "निजगात्रासृगुक्षितम्", सप्तशती में अपने ही रक्त और मांस की प्रोक्षित बलि दोनों ने 3 वर्ष तक दी थी भगवती की मृण्मयी मूर्ति के समक्ष, तप करते हुए।
नेताओं के दोगलेपन की पराकाष्ठा हो चुकी है — निग्रहाचार्य
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ईमानदार व्यक्ति रोटी-नमक खाता है, बेईमान मक्खन से... खाता है। आप उसको सुखी समझते हैं, इसको दुखी समझते हैं। भविष्य में जो उसको दुख मिलेगा, उसका ज्ञान आपको है क्या ?
और जो भी ईमानदारी से जीविकोपार्जन करेगा, दुखी रहेगा; लेकिन उसका जो दुख है वह तप है।
अच्छा, आप व्यायाम करते हैं, उसमें... एक्यूप्रेशर करवा लो एक हैं हमारे पास—शुक्ल जी। यह हैं, आपके पास ही बैठे हैं। एक्यूप्रेशर करवा लो। एक्यूप्रेशर में लगता है कि मर गए एकदम—यहाँ, यहाँ! लेकिन अंत में क्या होता है? रोग से मुक्ति।इसीलिए दुख-सुख की परिभाषा समझनी चाहिए।
और सचमुच में अगर आप भजन करते हैं... भजन करने वाले को कोई व्यक्ति कह दे कि 'क्या... बम से उड़ा दूंगा', वह कहेगा 'उड़ा दे, मैं भजन को नहीं छोड़ सकता।'
हमसे...
हमसे कोई कहे कि 'भजन करते रहोगे तो उड़ा दूंगा बम से', मैं कहूँगा 'अभी ले आओ बम, भजन नहीं छोड़ सकता।'
भजन के प्रति आसक्ति नहीं हुई, महत्व-बुद्धि नहीं हुई, तो कैसे पता चलेगा आप भजन करते हैं।
आज यदि मनुस्मृति इस देश में लागू कर दी जाए तो सबसे अधिक फायदा किसको होगा?
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उद्धारकर्ता श्रीभगवान्
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते । सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥ सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः । ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ।। तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् । भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥
हमारे क्षत्रिय कुल शिरोमणि आदरणीय निकुंज सिंह जी ने बलिया स्थित अब्राहमिक संस्था इस्कॉन को खुली चुनौती दे दी है।
इस्कॉन कहता है कि अल्लाह ही कृष्ण है यशु ही कृष्ण है परंतु ब्रह्म विष्णु महेश कृष्ण नहीं हैं।
ऐसी अवैदिक पाखंडी अब्राहमिक संस्था भारत भूमि पर कदाचित नहीं रहेगी।
On hero worship, secularism, unnatural equality, impending civil war, etc.
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भगवती राधा को काल्पनिक कहने वालों पर आचार्यगण हंसते हैं - जगद्गुरु निग्रहाचार्य
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Adhikāra is decided by Guru and Paramparā.
Not by you. Not by the crowd.
So do what your Guru says, and ignore the loudmouths on YouTube, Instagram or any social media.
No Guru yet? Then finding one is your first task.
Take a simple example:
Mahā Periyavā encouraged everyone to recite the Lalitā Sahasranāma. Strict Śrīvidyā traditions hold that even ordinary pārāyaṇa requires initiation.
An Ācārya's instruction establishes the path for those who follow him. Mahā Periyavā opened the Lalitā Sahasranāma widely as an act of bhakti.
Śrīvidyā Ācāryas preserve it within mantra-śāstra and therefore insist upon adhikāra and initiation.
Both positions are valid within their own sampradāya.
Follow your own Guru and your own tradition.
Har Har Mahadev 🌺😄
“राधाष्टमी के पावन अवसर पर श्री राधा रानी की असीम कृपा आप पर बनी रहे। आपके जीवन में प्रेम, भक्ति, शांति और आनंद का वास हो। राधे राधे!” 🌸🙏
जय जय श्री राधे! 🦚🌸💖
हाथोंसे, चरणोंसे, घुटनोंसे, वक्षःस्थलसे, सिरसे, नेत्रोंसे, मनसे और वाणीसे-इन आठ अंगोंसे किया गया प्रणाम साष्टांग प्रणाम कहलाता है।
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इतनी नकारात्मक विमर्श के बीच कुछ अच्छी चीजें भी हो रही है। उन्हें भी अपना पक्ष रखने का मौका मिल रहा है , जो इस विषय के ज्ञानी हैं। नहीं तो इनका पक्ष भी एक राजनैतिक दल और विचारधारा के कुपढ़ कार्यकर्ता रखते हैं।
फिलहाल एक भोजपुरिया ब्राह्मण की सुंदर चर्चा सुनिए।
भगवती जगदंबा दुर्गा: उत्पत्ति और महिमा का वर्णन !
पूरे भारत में उन्हीं देवी -देवताओं की पूजा की जाती है जो अस्त्र -शस्त्र धारण करते हैं और समय आने पर उन अस्त्र -शस्त्रों का सदुपयोग भी करते हैं। लेकिन उनके पूजक शस्त्र विहीन रहने में विश्वास करते हैं। इसलिए निरीहता के कारण असमय काल के गाल में समा जाते हैं।
माँ भगवती स्वयं अस्त्र शस्त्र धारण नहीं करती , इनकी पूजा कभी-कभी कहीं-कहीं होती है। हमारे यहाँ उसी देवी-देवता की पूजा होती है जो अस्त्र-शस्त्र धारण करते हैं, उसका सदुपयोग करते हैं। और दुर्गा कौन हैं? निःशेषदेवगणशक्तिसमूह्मूर्त्या...(श्री दुर्गा सप्तशती)। जितने देवता थे, अपनी सारी अकल और सकल शक्ति का उपयोग करके भी आतंकवादियों पर विजय नहीं प्राप्त कर पाते थे, देवताओं के समष्टि तेज से भगवती जगदंबा दुर्गा का प्रादुर्भाव हुआ।"
"तू विधि बधू रमा तू उमा महामाया।
माँ उमा महामाया अम्बे उमा महामाया।
मूल प्रकृति विद्या तू, तू जननी जाया।
जगजननी जय जय।"
कितनी मार्मिक बात कही है महाराज जी ने।👏
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दुख और सुख की सही परिभाषा — स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज !
"...उससे ज्यादा दुखी तो राम-कृष्ण थे...
वे तो कर्म का फल भोगने के लिए अवतार नहीं लेते न? भगवान तो कर्म का फल... उनके कर्म हैं ही नहीं।
तो जीवन किसको कहते हैं?
चारपाई पर ऐसे लेटे रहो, इसका नाम सुख है क्या? प्रह्लाद को जितना दुख था, उतना दुख तो आपको नहीं है। प्रह्लाद उसको दुख मानते थे या सुख?
और राम जी को, कृष्ण भगवान को... राम जी का, कृष्ण भगवान का जन्म कहाँ हुआ जी?
[श्रोता: कारागार में]
कारागार में! और अंत में बहेलिया ने... उससे ज्यादा दुख आपको है? वह दुख था क्या?
अब मेरा जीवन तो मेरे सामने है न! यह सब सहपाठी हैं, लेकिन पूरा जीवन तो मेरा मेरे सामने है न! और तो कोई व्यक्ति नहीं है, भगवान हैं और मैं हूँ।
लोग कहेंगे कि ग्रह-नक्षत्र आपका खराब है। लेकिन मुझे... आप बैकुंठ में... स्वर्ग में ले जाओ, मैं स्वर्ग से भी भाग आऊँगा।
क्या मतलब है? दुख-सुख की कल्पना अलग होती है न। प्रह्लाद को दुखी मानेंगे आप?
क्या? जो सत्य के मार्ग पर चलता है, उसे संघर्ष करना पड़ता है, वह तप है—उसका नाम दुख नहीं है।
इस देश में कुत्तों तक की समस्या सुनने हेतु व्यवस्था है पर अनारक्षित वर्ग हेतु कुछ नहीं, अपितु उन्हें झूठे मुकदमे में फंसाने हेतु सरकार उनके पैसे से ही असामाजिक तत्त्वों को बढ़ावा देगी - निग्रहाचार्य
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नित्य एक घंटा परिवार के साथ अवश्य बितायें।रामराज्य का सूत्र :---
घर में अगर रामराज्य लाना चाहते हैं,
एक घंटे का कार्यक्रम नित्य रखिए।
परिवार के जितने सदस्य हों बैठें
एक निश्चित समय पर।
प्राय: रात्रि में समय मिल सकता है।
दिन में काम धंधे में लगे रहते हैं,
वो भी आवश्यक है।
एक घंटा कम से कम
बैठें और कुछ नहीं तो
आठ-दस मिनट में हनुमान चालीसा का मिलकर के पाठ ही कर लें।
उसके बाद एक दूसरे की कुशल पूछें।
आजकल होता क्या है ?
परिवार में भी एक दूसरे के साथ बैठते नहीं।
एक दूसरे की परिवार के जितने सदस्य हैं कुशल पूछें।
और अगर कोई गांठ पड़ गई हो, ऐसा होता है।
किसी भूल की ओर संकेत करें !
कि आपसे यह भूलें होती हैं, यह भूलें होती हैं,
बेखटके भूल को स्वीकार कर लीजिए।
आपके प्रति कोई भ्रम पल रहा हो किसी के हृदय में,
तो भ्रम को दूर कर दीजिए
और भूल को स्वीकार कर लीजिए।
और भगवान का मिलकर के कम से कम
10 मिनट भजन कीजिए, फिर
और कुछ नहीं तो गीताप्रेस के जितने
विशेषांक निकले हैं 'कल्याण' के,
उनमें कोई न कोई विशेषांक लीजिए।
एक व्यक्ति एक लेख पढ़े, बाकी सब उसको
सुनें। इससे एक नीति और अध्यात्म
का संस्कार बनेगा।
द्वैत वेदान्त के पाठ्यक्रम में अम्बेडकर चरित्र पढ़ाया जा रहा है और मध्वाचार्य जी के सम्प्रदाय वाले आठों जगद्गुरु कुछ नहीं कर रहे, अपितु मोदी रक्षति रक्षितः करने में लगे हैं ! जो सरकार की खाते हैं वे सरकार को जवाब दें। हम भगवान् की खाते हैं और हमें उन्हें जवाब देना है — देवरिया में जगद्गुरु निग्रहाचार्य के कथन ...
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Why Absolute "Equality" (Samanata) is a Myth and Against Nature. 👇
समानता प्रकृति का धर्म ही नहीं है। भारत सोने की चिड़िया कहलाता था उसका मुख्य कारण क्या था? 👇
धर्म की जय हो—सब बोल लेते हैं, अच्छी बात है। प्रणाम सबको।
पर अधर्म के विनाश के लिए संघर्ष केवल जगद्गुरु शंकराचार्य ही करते दिखाई देते हैं।
बाकी सरकार के आगे शरणागत हैं—मांस निर्यात में नंबर 1 वाले UP मुख्यमंत्री को “यशस्वी” और मोदी को “यशस्वी प्रधानमंत्री” कहते हैं।
राम राम
मनु का विचार किसी जाति, वर्ग के लिए नहीं अपितु समस्त ब्रह्मांड के लिए हैं।
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भारत अघोषित हिंदू राष्ट्र है ही 🏹
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राधां कृष्णस्वरूपां वै कृष्णं राधास्वरूपिणम् ।
कलात्मानं निकुञ्जस्थं गुरुरूपं सदा भजे ॥
समस्त कुलकी भलाईके लिये एक पुरुषको, एक गाँवके हितके लिये एक कुलको, जनपदके भलेके लिये एक गाँवको और आत्मकल्याण के लिये समस्त भूमण्डलको त्याग दे ।।
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श्वेतवाराह कल्प वाले श्रीरामावतार में भगवान श्रीरामचन्द्र जी का विवाह लगभग १३ वर्ष की आयु में हुआ और वनवास मिला २५ वर्ष की आयु में।
In ŚriRāmāvatāra of Svetavārāha Kalpa, Bhagwāna ŚriRāmachandra ji was married at age of about 13, and was sent into exile at age of 25 years.
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते ।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ॥