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जय श्री कृष्ण 🚩
त्वमेव केवलं कर्ताऽसि। त्वमेव केवलं धर्ताऽसि।
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि।
केवल आप ही सृष्टि के कर्ता, धर्ता पालनकर्ता और हर्ता संहारकर्ता हो!
श्री गणपति उपनिषद का यह श्लोक श्री गणपति अथर्वशीर्षः का भाग है। श्री गणपति के परम विराट रूप को समझने का यह एक छोटा सा प्रयास है। बिना किसी नियम,जातिभेद, प्रणवभेद या कोई भी अवस्था में साधक और गृहस्थ इसका अभ्यास करें। इसके निरंतर पठन से साधक निश्चित रूप में स्थिरता और श्री गणेश कृपा भी प्राप्त करता है।
गाणपत्यों के लिए जो साधना से अवगत ना हों उनके लिए तो इसका नित्य त्रिवार पाठ करने का नियम है, यह सकल साधनाओं में सिध्दि प्रदान करने की ऊर्जा रखता है।
श्री दशभुजा गणपति, सिंदूर लेपन से लिप्त, और श्री देवी शक्ती को वामांग पे धारण किए हुए!
शास्त्रीय दृष्टि से ब्राह्मण क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र वही सिद्ध होते हैं जो शास्वत विधान भगवान मनु के सिद्धांत को माने अर्थात जो मनुवादी हों,शेष सब म्लेच्छ हैं।
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छबिखानि मातु भवानि गवनीं मध्य मंडप सिव जहाँ।
अवलोकि सकहिं न सकुच पति पद कमल मनु मधुकरु तहाँ॥
जगज्जननी पार्वतीजी की महान शोभा का वर्णन करोड़ों मुखों से भी करते नहीं बनता। वेद, शेषजी और सरस्वतीजी तक उसे कहते हुए सकुचा जाते हैं, तब मंदबुद्धि तुलसी किस गिनती में है? सुंदरता और शोभा की खान माता भवानी मंडप के बीच में, जहाँ शिवजी थे, वहाँ गईं।
वे संकोच के मारे पति (शिवजी) के चरणकमलों को देख नहीं सकतीं, परन्तु उनका मन रूपी भौंरा तो वहीं (रसपान कर रहा) था।
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कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूल धर्ता
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वराहश्चैव सिंहश्च त्रिविक्रमगतिः प्रभुः।
एष माता पिता चैव सर्वेषां प्राणिनां हरिः॥
He indeed is the Lord who, from time to time, manifested in the forms of Varāha, Nṛsiṁha,and Vāmana.
It is this Śrī Hari who is the father and the mother of all living beings.
~Mahabharat.
महादेव शिव शंकर शंभु उमाकान्त हर त्रिपुरारी
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शिव जी के चरित्र के विविध रूपों में से एक है उनका सद्गृहस्थ रूप। बीहड़ पर्वतों में गृहस्थी बसाई है तो पत्नी के कामों में सहायता करना उनका कर्तव्य है। नटखट बालक गणपति को माँ पैरों पर बिठाकर सँभाले और एक हाथ से कैसे नहलाए। पत्नी की कठिनाई समझकर पतिदेव उनका हाथ बँटाने उपस्थित हैं।
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एक एव रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः
Rudra alone is the supreme lord, there is none second to him. 🌺
शांति पाने के लिए कुछ करना नहीं पड़ता,
बस काफी कुछ ऐसे ही छोड़ देना होता है।
एकादशी व्रत का माहात्म्य एवं वर्षभर आने वाली २६ एकादशीयों के नाम स्मरण से एकादशी व्रत का फल (१/२)
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रोदसी व्याप्य कान्तिरभ्यधिका स्थितास्येति विष्णुः — He is called Vishnu because His radiance pervades the earth and the heavens, and remains even beyond them.
(Ādi Śaṅkara Bhāṣya, Viṣṇu Sahasranāma, Nama 657)
नामों के भेद में मत उलझो; हर नाम के पीछे वही एक सत्य विराजमान है।
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भगवान शिव ही ज्ञानस्वरूप गुरु हैं, उनमें जो भक्ति की जाती है, वही गुरुभक्ति मानी गई है।
••स्कन्द पुराण••
|| यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात्।
विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ||
ग्रहों के नैसर्गिक कारकतत्व
सूर्य-
पद, प्रतिष्ठा, पिता, आत्मतेज
चंद्र-
मन, भावनाएँ, गृह, मातृसुख
मंगल-
भूमि, साहस, पराक्रम, शक्ति
बुध-
व्यापार, बुद्धि, वाणी, कौशल
गुरु-
धन, ज्ञान, धर्म, विस्तार
शुक्र-
विवाह, सुख, सौंदर्य, भोग
शनि-
कर्म, संघर्ष, श्रम, न्याय
राहु-
अचानक वृद्धि, महत्वाकांक्षा, भौतिक छलांग
केतु-
वैराग्य, विच्छेद, आध्यात्मिकता,त्याग
जय केदार..कृपा अपार 🌺🙏🏻🔱🚩
कहिअ काह कहि जाइ न बाता। जम कर धार किधौं बरिआता॥
बरु बौराह बसहँ असवारा। ब्याल कपाल बिभूषन छारा॥
क्या कहें, कोई बात कही नहीं जाती। यह बारात है या यमराज की सेना? दूल्हा पागल है और बैल पर सवार है। साँप, कपाल और राख ही उसके गहने हैं॥
दूल्हे के शरीर पर राख लगी है, साँप और कपाल के गहने हैं, वह नंगा, जटाधारी और भयंकर है। उसके साथ भयानक मुखवाले भूत, प्रेत, पिशाच, योगिनियाँ और राक्षस हैं, जो बारात को देखकर जीता बचेगा, सचमुच उसके बड़े ही पुण्य हैं और वही पार्वती का विवाह देखेगा। लड़कों ने घर-घर यही बात कही।
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बंदउँ बालरूप सोइ रामू। सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू॥
मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥
भावार्थ :-मैं उन्हीं श्री रामचन्द्रजी के बाल रूप की वंदना करता हूँ, जिनका नाम जपने से सब सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। मंगल के धाम, अमंगल के हरने वाले और श्री दशरथजी के आँगन में खेलने वाले (बालरूप) श्री रामचन्द्रजी मुझ पर कृपा करें॥
श्री सीताराम🌺 सीताराम🌺 सीताराम🌺 🙏🏻🌺🚩
दुःख जीव को बार-बार स्मरण कराता है कि उसका वास्तविक सुख संसार में नहीं, भगवान् के चरणों में है।
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आज अमावस्या है
यदि अमावस्या के दिन श्रीमद्भागवत गीता के सातवें अध्याय का पाठ किया जाये और उसका फल पूर्वजों को समर्पित कर दिया जाए तो पितृ दोष, राहु केतु दोष और काल सर्प दोष में राहत मिलती है।
जय सियाराम 🌺🙏🏻🚩
कौन मनुष्य नहीं चाहेगा कि उसके पिता स्वर्ग के देवता या माता स्वर्ग की देवी हों? ऐसा मनुष्य कितना दिव्य होगा। स्वर्ग के देवता किसी कर्म के द्वारा अपवित्र नहीं होते हैं। उनका देह पाप और पुण्य से मुक्त होता है।
कौन मनुष्य नहीं चाहेगा कि उसके पिता स्वर्ग के देवता या माता स्वर्ग की देवी हों? ऐसा मनुष्य कितना दिव्य होगा। स्वर्ग के देवता किसी कर्म के द्वारा अपवित्र नहीं होते हैं। उनका देह पाप और पुण्य से मुक्त होता है। 🚩
संप्राप्य मानुषं जन्म ज्ञात्वा देवं महेश्वरम् ।
शिवरात्रिः सदा कार्या भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी ॥
- स्कन्दपुराणम्, ७.२.१६.१०३
Having obtained human birth, and having realised Maheshvara (Shiva) as the Supreme God, one should always observe Shivaratri, as it bestows both worldly enjoyment (Bhukti) and spiritual liberation (Mukti).
महाशिवरात्रि व्रत का महात्म्य एवं शास्त्रोक्त पूजन विधि।
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एकादशी व्रत का माहात्म्य एवं वर्षभर आने वाली २६ एकादशीयों के नाम स्मरण से एकादशी व्रत का फल (२/२)
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मनुष्य के मन ने अस्तित्व को दो हिस्सों में तोड़कर एक हिस्से का चुनाव किया और दूसरे का इनकार किया। इससे द्वंद्व पैदा हुआ, इससे द्वैत हुआ। कृष्ण दोनों को एक-साथ स्वीकार करने के प्रतीक हैं।
जो दोनों को एक-साथ स्वीकार करता है, वही पूर्ण हो सकता है। कृष्ण मानव चेतना की संपूर्णता का प्रतीक है... उसके संपूर्ण व्यक्तित्व का तरल प्रतिबिंब।
भगवान का प्रत्यक्ष दर्शन क्षणिक हो सकता है, पर उनकी स्मृति और प्रेम ही शाश्वत धन है। ❤️
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यथा शिवस्तथा विद्या यथा विद्या तथा गुरु:। -शिवमहापुराण
जैसे शिव हैं, वैसी विद्या है। जैसी विद्या है, वैसे गुरु हैं। भगवान शिव, विद्या और गुरु के पूजन से समान फल मिलता है।
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यवन निर्बल होने पर दीनता का दिखावा करके चुपचाप बलवृद्धि करते हैं। जब बलवान हो जाते हैं तो…
Yavana-s play minority card when weak, but also keep gathering strength quietly. When their numbers become sufficient, then…