एक उम्मीद से दिल बहलता रहा
एक तमन्ना सताती रही रात भर
फैज अहमद फैज
दिल के हाथों रूह अगर घबरा गई
कौन उस वहशी को फिर बहलाएगा
कब तलक तेरे इश्क को रोऊं
मेरे घर के भी सौ मसले है
- साहिर लुधियानवी
फूल कुछ रोज में लौट आएंगे
दिल दोबारा नहीं खिलना, अफसोस
इदरीस बाबर
ग़मों की दोपहर में काम आया
किसी के रेशमी आँचल का साया
- सेवक नैयर
तेरे नाम
अधूरी नज्म
कलम कोरे कागज पे उतरने से पहले
वहां तेरी तस्वीर के हजारवें रुख की
परतें खोले लफ्जों की वहशत भरी
खूबसूरती अपने अंदर उतार रहा है
मुझे पुकार रहा है!!!
जबके बहुत अरसा पहले दबे पांव
मैं तेरी दहलीज से उठ आई हूं
फकीर, फकीर की कहां बर्दाश्त करता है
मलंग,मस्त,बदहाल ,आशिक, और
हिजरत के मारे सब उधर उधर बिखरे
कबूतरों की उड़ान निगाहों में लिए
पलकें मोंदे गटर गूं गटर गूं की आवाज पे मस्त होए जाते हैं
फजा में महसूस करो
सुकून ही सुकून चारों सिम्त से उमड रहा है
कहां किसी को कोई याद आ रहा है
सब अपने दिल की लगी का मातम कर रहे हैं
जमाना जी रहा है हम मर रहे हैं
इश्क नचावे गली गली
अब तो कई जदीद नगमे उस की नफी कर रहे हैं
हां
मगर नई लुग्तों में
उसके मानी फैशन के जमरे में लिए जाते हैं
तबाही से कोसों दूर
हर आसान रास्ता
इश्क की दरकार है यही आज का प्यार है
यास्मीन सहर
खुदा करे तेरी आंख वह न देख सके
जो हमने तेरी मोहब्बत में देख रखा है
फरख अदील
दिल में उतर गए हैं के दिल से उतर गए?
फुरसत कभी मिले तो ये सोचा भी कीजिए
ज़मीं ता आस्माँ कोई नहीं है
कहें हम किस को जाँ कोई नहीं है
मेरे लशकर में हैं सब बुढे बच्चे
जवाँ या नौजवाँ कोई नहीं है
बहुत तन्हा हूँ शहरे अजनबी में
मेरा अपना यहाँ कोई नहीं है
रहा है सीधा साधा रब्त उस से
हमारे दरमियाँ कोई नहीं है
बहूत हैं चाहने वाले तो लेकिन
तेरे जैसा तो माँ कोई नहीं है
बने फिरते है सब इंसाफ वाले
मगर आदिल यहाँ कोई नहीं है
आदिल फारूकी
हजार फायदे होंगे मोहब्बतों के मगर
तू जानता है के ये काम! हम नहीं करेंगे
इश्क की मशक में नाकामी भी हो सकती है
आपकी जात की नीलामी भी हो सकती है
यास्मीन सहर
दोस्तों को भी मिले दर्द की दौलत या रब
मेरा अपना ही भला हो मुझे मंजूर नहीं
हफीज जालंधरी
जनाब शेख पर अफसूस है, हम ने तो समझा था
हरम के रहने वाले ऐसे ना महरम नहीं होंगे
अगरचे इश्क में मरने का खतरा ही ज्यादा है
मगर मरने के डर से मरने वाले कम नहीं होंगे
कलीम आजिज
मेरे दिल में भी जगह तू ने बना ली दुनिया
शहर तो शहर था सेहरा नहीं छोड़ा तू ने
अख्तर उस्मान
एक पल में जिंदगी भर की उदासी दे गया
वो जुदा होते हुए कुछ फूल बासी दे गया
नूच कर शाखों के तन से खुश्क पत्तों का लिबास
जर्द मौसम बांझ रुत को बे लिबासी दे गया
सुबह के तारे मेरी पहली दुआ तेरे लिए
तो दिल बे सब्र को तसकीन जरा सी दे गया
लोग मलबों में दबे साए भी दफनाने लगे
जलजला अहले जमीं को बदहवासी दे गया
मुहसिन नकवी
उठो ये मंज़र-ए-शब-ताब देखने के लिए
कि नींद शर्त नहीं ख़्वाब देखने के लिए
~ इरफ़ान सिद्दीक़ी ..
आंख में अश्क न हो दिल से उजाले जाएं
ऐसी गुरबत हो तो फिर ख्वाब न पाले जाएं
तरन्नुम सना
डूब जाता है दमकता सूरज लेकिन
मेंहदिया शाम के हाथों में रचा देता है
शहजाद अहमद
किस मुंह से दे रहे हो उसे जिंदगी का नाम
हंस कर गुजर गई जो किसी अजनबी के साथ
यास्मीन सहर
अंदाज हू बहू तेरी आवाज पा का था
देखा निकल के घर से तो झोंका हवा का था
अहमद नदीम क़ासमी
बुरा न मान 'ज़िया' उस की साफ़-गोई का
जो दर्द-मंद भी है और बे-अदब भी नहीं
#Zia_Jalandhari
पल भर वह चश्मे तर से मुझे देखता रहा
फिर उसके आंसुओं से मेरी आंख भर गई
मकबूल आमिर
चौंक उठती हूं तेरे नाम पर अब भी अक्सर
इतने बरसों में भी बदली नहीं आदत मेरी
यास्मीन सहर
खिड़की खोल के देख तो बाहर
देर से कोई शख्स खड़ा है
नासिर काजमी
बहुत लंबी गुफ्तगू करनी है तुम से
तुम आना मेरे पास पूरी जिंदगी लेकर
इस घर की सारी दीवारें शीशे की हैं
लेकिन इस घर का मालिक खुद एक पत्थर है
रसा चुगताई
वो जंगलों में दरख़्तों पे कूदते फिरना
बुरा बहुत था मगर आज से तो बेहतर था
~ मोहम्मद अल्वी
जी में आता है करे कैद सभी रंगों को
एक हंसती हुई तस्वीर बना लें तेरी
सरवत मुख्तार
समझ जाता हूं चालों को मगर कुछ देर लगती है
वो बाजी जीत जाते हैं मेरे चालाक होने तक
ये राज खोल दिया तेरी कम निगाही ने
सुकूं की एक नजर, दर्द के बहुत पहलू
ताबिश देहलवी