पतझड़ में बहारों की फजा ढूंढ रहा है
पागल है जो दुनिया में वफा ढूंढ रहा है
खुद अपने हाथों से वो घर अपना जलाकर
अब सर को छुपाने की जगह ढूंढ रहा है
कल रात तो ये शख्स जिया बांट रहा था
क्यों दिन के उजाले में दिया ढूंढ रहा है
शायद के अभी उस पे जवाल आया हुआ है
जुगनू जो अंधेरे में जिया ढूंढ रहा है
उसको तो कभी मुझ से मोहब्बत ही नहीं थी
क्यों आज वो फिर मेरा पता ढूंढ रहा है
किस शहरे मुनाफिक में ये तुम आ गए सागर
एक दूजे की हर शख्स खता ढूंढ रहा है
सागर सिद्दीकी
तो अभी जीत के आया है खुशी बनती है
तुझ को एहसास नहीं है के तो हारा क्या है?
सज्जाद कातिब
मैं अपना एक मिनट भी बर्बाद नहीं करना चाहता
किसी अनजान से हाथ मिलाने में
यूँ ही रस्मन मुस्कुरा कर किसी से बात करने में
किसी को जानने की झूठी दिलचस्पी दिखाने में
"मैं ठीक हूँ, आप बताएँ", का जवाब देने में
किसी का दुखड़ा सुनने में
किसी के कंधे पर हाथ रखकर कहने में कि सब ठीक हो जाएगा।
मेरे पास अपनी समस्याएँ हैं
ढेरों ग़म हैं
सैकड़ों ज़िम्मेदारियाँ
और वक़्त बहुत कम है
वक़्त इतना कम है मुझपे
कि मैं ये सब कुछ छोड़कर
धूप सेंकते हुए एक बूढ़े के पास जाकर बैठ जाऊँगा
और कहूँगा, "आज ठण्ड कुछ कम है, कल से"।
साहिल त्यागी बेजार
मैंने मुद्दत से कोई ख्वाब नहीं देखा
हाथ रख दे मेरी आंखों पे, के नींद आए...
मत पूछो कितना गमगीन हूं गंगा जी और जमना जी
मैं खुद अपना सूग नशीं हूं गंगा जी और जमना जी
बान नदी के पास अमरोहे में जो लड़का रहता था
अब वो कहां है मैं तो वहीं हूं गंगा जी और जमना जी
जौन ऐलिया
जो चांटेने लगा है मेरे तन की मट्टी को
वह रेंगता हुआ कीड़ा समझ से बाहर है
--यास्मीन सहर
तू अपने पास अगरचे हजार गहने रख
हंसी हयात[जिंदगी] का जेवर है उस को पहने रख
--साबिर जफर
मैं इतना नर्म तबीयत के ये भी चाहता हूं
जो आस्तीन में रहता है वो भी पल जाए
अब जो हिचकियां आए तो पानी पी लेना
ये वहम छोड़ देना तुम्हें हम ने याद किया
तुझ को तकना, तुझे सुनना, तेरा हंसना मचल जाना
हमारे गम के आंगन में, फकत दो चार खुशियां हैं
--- हस्सान अहमद
मैं यहां पर नहीं हूं और हर रोज
तुम यहां मिलने चले आते हो
यास्मीन सहर
उदास हो किसी की बेवफाई पर
वफा कहीं तो कर गए हो, खुश रहो
मैं झपटने के लिए ढूंढ रहा हूं मौका
और वो शौख समझता है के शर्माता हूं
इरफान सिद्दीकी
ये भी अजीब दुख है के पूरे जहां में
निकला न एक भी शख्स मेरे मिजाज का
उसे हंसते नहीं देखा, कई दिन से
मेरा सूरज नहीं निकला, कई दिन से
सुलगती हैं, मेरे हाथों की पूरें
उसे छूकर नहीं देखा, कई दिन से
--- अख्तर शुमार
न हारा है इश्क और न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है, हवा चल रही है
--- खुमार बारा बांकवी
एक पटरी पे आ गए दो दिल
हादसा अब नहीं तो कब होगा
---शाहजहां शाद
तेरी दीदार के खातिर आते हैं तेरे गलियों में
वरना आवारगी के लिए तो सारा शहर पड़ा है
हर कोई नहीं होता निभाने वाला
यूं न चल दिया करो सब के पीछे
रात को जागते रहना नहीं अच्छा लेकिन
रात को जागते रहने का सबब, अच्छा है
हम अमन चाहते हैं मगर जुल्म के खिलाफ
गर जंग लाजमी हैं तो फिर जंग ही सही
जालिम को जो न रुके वह शामिल है जुल्म में
कातिल को जो न टूके वह कातिल के साथ है
हम सरबकफ उठ्ठे हैं के हक फतहयाब हो
कह दो उसे जो लश्कर ए बातिल के साथ है
इस ढंग पे है जूर तो ये ढंग ही सही
जालिम की कोई जात न मजहब न कोई कौम
जालिम के लब पे जिक्र भी उनका गुनाह है
फलती नहीं है शाख सितम इस जमीन पर
तारीख जानती है जमाना गवाह है
कुछ कोर बातिनों की नजर तंग ही सही
ये जर की जंग है न जमीनों की जंग है
ये जंग है बका के उसूलों के वास्ते
जो खून हमने नजर दिया है जमीन को
वह खून है गुलाबों के फूलों के वास्ते
फूटेगी सुबह अमन लहूरंग ही सही
साहिर लुधियानवी
तेरी तरफ से मुझे हौसला नहीं मिलता
वगर न जीने की कोशिश तो कर रहा हूं मैं
---मोहम्मद ताहा इब्राहीम
कैसी ये रहबरी थी, ये कैसा फरेब था
मंजिल दिखा के राह से भटका गया मुझे
मुझे पता है आप थक चुके हैं
लेकिन मायूस न हो,
आओ, आओ यहां मायूसी का कोई गुज़र नहीं
हम बैठ कर खुदा से मोहब्बत की बातें करते हैं
आओ ये काफिला मायूसी जदा काफिला नहीं
हजार बार वादा तोड़ चुके हैं!
कोई बात नहीं, कोई मुश्किल नहीं
आते रहो फिर भी आते रहो
-- जलालुद्दीन रूमी
🌀🌻 @Pyari_Shayri 🌻🌀
इसलिए तो मजा नींद का उठाते हो
तमाशा तुमने अभी ख्वाब का नहीं देखा
-- यास्मीन सहर
क्या खबर कौन सी खुशी के लिए
दिल यूंही दिन गंवाए जाता है
उलट कर मेरी नाव खुश रहो तुम
समुंद्र की हवाओ, खुश रहो तुम
तुम्हें जाना है जाऊ, खुश रहो तुम
मैं भर लूंगा ये घाव, खुश रहो तुम
तुम्हारी दिलरूबाई रास आई
मेरी सब दिलरूबाऊ, खुश रहो तुम
अरे इतनी मोहब्बत! खैर तो है
अरे इतना लगाऊ! खुश रहो तुम
बिछड़कर मुझ से कितने खुश रहे हो
मुझे तो मत बताओ! खुश रहो तुम
ये किस बेजा तकल्लुफ में पड़े हो
छुड़ाऊ हाथ, जाऊ! खुश रहो तुम
साजिद रहीम
ये डिग्रीयों के पुलिंदे ये रोल ऑफ ऑनर
संभालिए के जलाने के काम आएंगे
संभाल रखे हैं सीने के सब दराजों में
कुछ ऐसे दिन जो भुलाने के काम आएंगे
दिन बहल जाता है लेकिन तेरे दीवानों की
शाम होती है तो वहशत नहीं देखी जाती
प्रवीन शाकिर