-
ब्रम्हचर्य पालन करने वालो के लिये विश्व का सर्वोत्तम टेलिग्राम चॅनल, यहा पर आपको ब्रम्हचर्य के बारे मैं सटीक और सही जाणकारी मिलेगी लेख और pdf पुस्तके | इस भारत वर्ष मैं फिर से ब्रम्हचर्य की महिमा का परिचय सबको कराये यही हमारा उद्देश है| #hastag
कर्म और विचार में पवित्रता की कमी लगभग सभी दुखों, जीवन में असंतोष, मानसिक बीमारी, युवावस्था में कम जीवनीशक्ति, सुस्त बुद्धि, कई घातक बीमारियों, और अनगिनत असामयिक मृत्यु का कारण बनती है।
Читать полностью…
चरित्रवान बनो , व्याभिचारी नहीं जिससे लोगों का भरोसा आप पर बना रहे ! चरित्रवान बनने के लिए ब्रम्हचर्य की भट्टी से गुजरना पड़ेगा !
Читать полностью…
और “वीर्यनाश” करने वाला व्यक्ति उस मुरझाए हुए फूल के समान होता है, जो जहा कही भी जाता है, वहा अपनी दुर्गंध से उस जगह को मायूस कर देता है।
Читать полностью…
हमें पवित्र क्यों बनना है ?
ब्रह्मचर्य का पालन करना क्यों जरूरी है ?
क्योंकि हम दुनिया को नहीं बना सकते हैं, दुनिया को नहीं चला सकते हैं, हमारे वश में पूरी दुनिया नहीं है, हम तो सिर्फ सहयोग दे सकते हैं। हम पवित्र बन जाएंगे, तो दुनिया कैसे चलेगी इसकी चिंता हमें नहीं करनी है क्योंकि दुनिया चलाने का कार्य परमात्मा का है परमात्मा की श्रीमत से ही हमें पवित्र बनना है। पवित्र क्यों बनाना है इसकी कुछ बातें:-
1. हमें स्वयं पवित्र बनकर पूरे भारत को, पूरे विश्व को पवित्र बनाने में परमात्मा की मदद करनी है इसलिए हमें पवित्र बनना है।
2. पवित्रता, सुख, शांति की जननी है, अगर हमें सुख और शांति चाहिए तो हमें पवित्र बनना है।
3. सतयुग, स्वर्ग में सुख, शांति, पवित्रता संपूर्ण होती है अगर हमें सतयुग, स्वर्ग में जाकर सुख, शांति, पवित्रता की अनुभूति करना है, चलना है तो हमें पवित्र बनना है।
4. पवित्रता सुख, शांति, खुशी का फाउंडेशन है अगर फाउंडेशन नहीं होगा तो सुख, शांति, खुशी मिल नहीं सकती।
5. जो ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण बनते हैं, वह पवित्र ब्राह्मण ही परमात्मा के द्वारा रचे गए अविनाशी रूद्र गीता ज्ञान यज्ञ की संभाल करते हैं जो पूरे कल्प में उन ब्राह्मणों का गायन है, बिना पवित्रता के यज्ञ की संभाल नहीं कर सकते इसलिए हमें पवित्र करना है।
6. जो आत्माएं पवित्र बनती है वह परमात्मा के दुआओं की अधिकारी बनती है, परमात्मा से दुआएं लेनी है, आशीर्वाद लेना है तो पवित्र बनना है इसलिए हमें पवित्र बनना है।
7. हमें सिर्फ ब्रह्मचर्य ही नहीं अपनाना है बल्कि मन, वचन, कर्म, संबंध संपर्क, संकल्प, स्वप्न में भी पवित्रता अपनानी है, नहीं तो कहीं से भी विकारों की प्रवेशिता होगी।
8. पवित्रता को अपनाने से जो भी व्यर्थ सोचना, देखना, बोलना और करने में हम फुल स्टाप लगाकर उसे परिवर्तन कर सकते हैं।
9. पवित्र बनने से हम त्रिकालदर्शी बन जाएंगे, तीनों कालों को देखने की हमारी पवित्र दृष्टि बन जाएगी, जिससे हम तुरंत निर्णय ले सकते हैं, हम कुछ भी देख सकते हैं इसलिए हमें पवित्र बनना है।
10. पवित्रता में बल होता है पवित्रता को अपनाने से हम हलचल में नहीं आते हैं। जैसे मंदिर में मूर्तियां पवित्र होती हैं उनके आगे सभी सिर झुकाते हैं। पवित्र गुरु, संत, महात्माओं के आगे सिर झुकाते हैं।
11. पवित्रता मुझ आत्मा का स्वधर्म है इसलिए पवित्र रहकर हमें अपने धर्म में स्थित रहना है।
12. परमात्मा से सर्व प्राप्तियां करने के लिए हमें पवित्र रहना है।
13. पवित्र बनने से ही हम सभी को शुभ भावना, शुभकामना दे सकते हैं।
14. पवित्र बनने से हमें अतिंद्रीय सुख की अनुभूति होगी इसलिए हमें पवित्र बनना है।
मनुष्य के शरीर में व्याप्त वीर्य इंसान को उत्साह प्रदान करता है । ऐसा व्यक्ति कार्य करते समय आनंदित रहता है.
Читать полностью…
. अत्यधिक वीर्य- नाश के कारण चेहरा और शरीर पूरी तरह से खोखला हो जाता है, जवानी में ही बुढ़ापे वाली लक्षने दिखनी लग जाती है।
Читать полностью…
प्रश्न:- बंधन में कौन है?
उत्तर:- जो लालची है
प्रश्न:- घोर नरक क्या है?
उत्तर:- अपना शरीर
प्रश्न:- शत्रु कौन हैं?
उत्तर:- अपनी इन्द्रियाँ; परन्तु जो जीती हुई हों तो वही मित्र हैं
प्रश्न:- गरीब कौन है?
उत्तर:- जिसे अभी और चाहिए
प्रश्न:- और धनवान् कौन है?
उत्तर:- जिसे संतोष है
प्रश्न:- वास्तव में फाँसी क्या है?
उत्तर:- जो ‘मैं’ और ‘मेरापन’ है
प्रश्न:- अन्धा कौन?
उत्तर:- जो वासना से व्याकुल है
प्रश्न:- जगत को किसने जीता?
उत्तर:- जिसने मन को जीता
प्रश्न:- वीरों में सबसे बड़ा वीर कौन है?
उत्तर:- जो कामबाणों से पीड़ित नहीं होता
प्रश्न:- सदा दु:खी कौन है?
उत्तर:- जो संसार के भोगों का लालच रखता है
प्रश्न:- पशु कौन है?
उत्तर:- जो सद्विद्या से रहित है
प्रश्न:- किसका जन्म सराहनीय है?
उत्तर:- जिसका फिर जन्म न हो
प्रश्न:- किसकी मृत्यु सराहनीय है?
उत्तर:- जिसकी फिर मृत्यु नहीं होती
प्रश्न:- गूंगा कौन है?
उत्तर:- जो समय पर उचित वचन कहने में समर्थ नहीं है
प्रश्न:- और बहिरा कौन है?
उत्तर:- जो यथार्थ और हितकर बात नहीं सुनता
प्रश्न:- बिजली की तरह क्षणिक क्या है?
उत्तर:- धन, यौवन और आयु
प्रश्न:- सबसे उतम दान कौन सा है?
उत्तर:- जो सुपात्र को दिया जाए
हनुमान जन्मोत्सव की सभी भारतवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं 🙏
Читать полностью…
ब्रह्मचर्य के अभाव से हम किसी अस्था में सुखी और उन्नत नहीं हो सकते।
Читать полностью…
न तपस्तप इत्याहु ब्रह्मचर्य तपोत्तमम्।
ऊर्ध्वरेता-भवेद्यम्तु से देवो न तु मानुषः॥
अर्थात् जननेन्द्रिय-संयम द्वारा मनुष्य देवताओं के गुण को प्राप्त हो जाता है, उसका दैहिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियों का पूर्ण विकास होता है।
कुछ मूर्ख लोग सोचते हैं की शादी (विवाह) न करना ब्रह्मचारी बनना है और भगवा वस्त्र पहन लेने और अपना नाम ब्रह्मचारी प्रचारित करवाने ले लेने से कोई ब्रह्मचारी नहीं हो जाता। कर्म ब्रह्मचर्य के नियम अनुसार हो तभी वो ब्रह्मचारी होता है। विवाह न करना और ब्रह्मचारी
कहलबाना मूर्खता के सिवाय और कुछ नहीं है।
हमारी किसी से कोई जबरदस्ती नहीं है, आप सब स्वतंत्र है, लेकिन श्रेष्ठ जीवन के लिए, स्वस्थ्य जीवन के लिए, और दीर्घायु के लिए ब्रह्मचर्य ही एकमात्र विकल्प है।❤️
Читать полностью…
मनुष्य वास्तव में शरीर नहीं है। वह अनादि, अनंत, चैतन्य एवं आनन्दस्वरूप आत्मा है। उसमें अज्ञान अथवा दुष्प्रवृत्तियों का कोई विकार नहीं है। वह निर्विकार, एकरस, चेतन तत्त्व है, जिसको न तो शस्त्र । काट सकता है, न पानी गीला कर सकता है, न हवा । सुखा सकती है और न अग्नि जला सकती है। वह अपनी ज्योति से स्वयं प्रकाशवान ऐसा शिव एवं शाश्वत दीपक है, जिसको न तो विपरीतताएँ प्रभावित कर सकती हैं और न काल बुझा सकता है।
वीर्य के बारे में सारा संदेह मिटाना हो। तो अपने अनुभव पे चिंता करो। आज तक वीर्य नाश से तुम्हारा शरीर खराब हुआ या अच्छा। जवाब तुम्हे
खुद अंदर से मिल जायेगा।। बाहर तुम्हे किसी से और कही से जानने की जरूरत नहीं है। हर तरफ से गुमराह ही होगे। भगवान कि रची इस दुनिया में अनुभव से बड़ा ना कोई शिक्षक है और ना ही कोई
तथ्य।।
नेत्रों से अंधा तो मात्र आंखों से देख नहीं पाता । परन्तु कामवासना में अंधा तो बुद्धि , मन और इंद्रियों से विकलांग होता है ।
काम विकारो को दबा
देना ही इंन्द्रिय दमन है जिनका मन शुद्ध और
संयमी है वह अपने वीर्य
को रोक सकता है ।
श्रद्धा रखने वाले मनुष्य, अपनी इन्द्रियों पर संयम रखने वाले मनुष्य, साधनपारायण हो अपनी तत्परता से ज्ञान प्राप्त कते हैं, फिर ज्ञान मिल जाने पर जल्द ही परम-शान्ति (भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्ति) को प्राप्त होते हैं।
Читать полностью…
जब कभी भी वी-र्य निकालने तलब मन में उठे। तो मात्र एक बार अपने आप से ये सवाल पूछ लेना कि क्या मैं अपना जीवन रोते- रोते जीना चाहता हूं? यदि उत्तर मिले हां तो बेसक वी-र्य निकाल फेंकना। लेकिन अगर जवाब आए नहीं .. तो वी-र्य हरगिज़ मत गिरने देना।
Читать полностью…
तकदीर बदलने की ताकत रखता है ब्रह्मचर्य । किस्मत में लिखा ना हो वो भी मिल सकता है ब्रह्मचर्य से ।। सारे सपने पूरे करने की ताकत रखता है ब्रह्मचर्य ।
Читать полностью…
ये मन, इन्द्रियाँ और बुद्धि,
सब तुम्हें गिराते हैं । ये सब नीचे की तरफ़ लगातार दौड़ते रहते हैं । सत्संग किया करो । ये ही इन सब की लग़ाम को कसता है । अन्यथा इस
कलयुग में बचना बहुत दुर्लभ है।
गालों पर की पहली कि वह गुलाबी छटा नष्ट होकर गालों पर काले दाग पड़ने लगते हैं यह अत्यंत वीर्य नाश का निश्चित लक्षण है।
Читать полностью…
चरित्रवान बनो, संसार स्वयं तुम पर मुग्ध होगा.
फूल खिलने दोगे तो मधुमक्खियाँ स्वतः ही चली आयेंगी.
राकृष्ण परमहंस
जिसका मन नित्य - निरंतर
सच्चिदानंद ब्रह्म में विचरण करता है,
वही पूर्ण ब्रह्मचारी है। इसमें प्रधानं आवश्यकता है - शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि के बल की । यह बल प्राप्त होता है वीर्य की रक्षा से । इसलिए सब प्रकार से वीर्य की रक्षा करना ही ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना कहा जाता है ।
अपने दिमाग में गहराई से ये बात
बैठा दें कि वीर्य संरक्षण करना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारा दिमाग
केवल वही कार्य करता है जो उसे
लगता है कि बहुत महत्वपूर्ण है।
वीर्य को नष्ट करने वाला पुरुष कभी बच नहीं सकता और वीर्य को धारण करने वाला कभी अकाल में भी मर नहीं सकता।
Читать полностью…
“परिवर्तन के बिना प्रगति असंभव है। जो अपने
मन को नहीं बदल सकते, वे कुछ भी नहीं बदल
सकते।”
भीष्म अमित आत्मबल से सम्पन्न योद्धा थे उन्होने कृष्ण से कहा था आपको प्रतिज्ञा तोड़ने पर विवश कर दूंगा ओर गोविंद ने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ी क्योंकि भीष्म जैसे महान योद्धा के लिए स्वयं कृष्ण को
प्रतिज्ञा तोडनी पड़ी इससे पितामह युग युग मे अमर हो गए यह ब्रह्मचर्य का ही प्रताप था कि भीष्म पितामह १८० बर्ष की आयु में भी समस्त पांडवों पर भारी थे।, और अगर उन्हें कुशलतापूर्वक शरशय्या पर नहीं सुलाया जाता तो निश्चित ही पांडवों की हार होती,
ब्रह्मचर्य तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ तप हैं, इसलिए आप सब ब्रह्मचर्य पालन अवश्य करें।
पालो व्रत ब्रह्मचर्य विष्ण-वासनाएँ त्याग । ईश्वर के भक्त बनो जीवन जो प्यारा है ॥ उठिये प्रभातकाल रहिये प्रसन्नचित्त । तजो शोक चिन्ताएँ जो दुःख का पिटारा है । कीजिये व्यायाम नित्य भ्रात ! शक्ति अनुसार । नहीं इन नियमों पै किसीका इजारा' है ॥ देखिये सौ शरद औ' कीजिये सुकर्म प्रिय ! सदा स्वस्थ रहना ही कर्तव्य तुम्हारा है । लाँघ गया पवनसुत ब्रह्मचर्य से ही सिंधु । मेघनाद मार कीर्ति लखन कमायी है ।। लंका बीच अंगद ने जाँघ जब रोप दई । हटा नहीं सका जिसे कोई बलदायी है ॥ पाला व्रत ब्रह्मचर्य राममूर्ति, गामा ने भी । देश और विदेशों में नामवरी पायी है । भारत के वीरो ! तुम ऐसे वीर्यवान बनो । ब्रह्मचर्य महिमा तो वेदन में गायी है।
Читать полностью…
जो लोग वीर्य निकालते हैं और ये भी सोचते हैं कि वे जीवन में सफ़ल भी होंगे ये बिलकुल झूठी बात है क्योंकि ज़र्ज़र काया से जीत हासिल नहीं होती।
Читать полностью…
'काम' और 'प्रेम' में अन्तर
इस संसार में एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति से मृदुल नाता जोड़ने वाला जो मनोभाव है, उसी का नाम 'प्रेम' है। जैसे पृथ्वी का गुरुत्व आकर्षण चीज़ों को अपनी ओर आकर्षित करता है, वैसे ही एक व्यक्ति में दूसरे के प्रति जो आकर्षण होता है, उसी को ‘प्रेम' कहा जाता है। प्रेम ऐसी मनोस्थिति है अथवा एक ऐसा अनुभव है जो 'आनन्द' के अति निकट है, नहीं, नहीं, प्रेम तो आनन्द का सहगामी ही है अथवा आनन्द का उत्पादक ही है। यदि संसार में प्रेम न हो तो मनुष्य का जीना ही मुश्किल हो जायेगा क्योंकि तब मनुष्य किस लिए जीए, किसके साथ जीए ? अतः प्रेम जीवन को स्थिर रखने वाला, जीवन का सार है अथवा मनुष्य के मन को भाने वाला एक रस है ।
प्रेम ही का विरोधी मनोभाव घृणा है। घृणा से अनेकानेक अशान्तिकारी तथा दुःखोत्पादक संकल्प-विकल्प और विचार उत्पन्न होते हैं परन्तु प्रेम से मनुष्य के मन में एक-दूसरे के कल्याण की भावना पैदा होती है। प्रेम मनुष्य को दूसरे के लिए अपने सुख को त्यागने में भी सुख की अनुभूति करता है जबकि घृणा से मनुष्य के मन को एक दाह का अनुभव होता है और वह दूसरे के सम्बन्ध अथवा सम्पर्क को ही त्याग देना चाहता है। अतः प्रेम एक स्वाभाविक, आवश्यक और सात्विक गुण है। परमात्मा के प्रति मन में प्रेम का होना ही भक्ति तथा योग है। परमात्मा के प्रेम की एक बूँद प्राप्त करने के लिए भी प्रभु - प्रेमी व्यक्ति अपने जीवन की बाज़ी लगाने को तैयार हो जाता है। प्रेम एक बहुत ही उच्च, बहुत ही पवित्र गुण अथवा अनुभूति है । परन्तु मनुष्य ग़लती से इसके विकृत रूप को भी प्रेम मान बैठता है। वह मोह, काम और लोभ को भी 'प्रेम' समझ बैठता है। अतः वह इनकी दलदल में फँस कर जीवन को दुःखी - बना बैठता है।